Summary
यह वीडियो बाल विकास और शिक्षाशास्त्र (CDP) के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्यायों जैसे सूक्ष्म शिक्षण, शिक्षण के स्तर, संप्रेषण, शिक्षण सूत्र और शिक्षण कौशलों को पूरी तरह से कवर करता है। शिक्षक आदेश नागर ने इन विषयों के मूल सिद्धांतों को बहुत सरल और रोचक भाषा में समझाया है। इस क्लास में यूपीटेट (UPTET) और अन्य परीक्षाओं के पिछले वर्षों के प्रश्नों का विश्लेषण करके आसान ट्रिक्स प्रस्तुत की गई हैं, ताकि छात्र किसी भी परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त कर सकें।
Key Insights
सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) का मूल ढांचा और उसके चक्र का समय विभाजन
डी.डब्ल्यू. एलेन, एचिसन और बुश द्वारा विकसित सूक्ष्म शिक्षण को 'घटाव शिक्षण' या 'अवश्रेणियन शिक्षण' भी कहा जाता है। इसके भारतीय प्रतिमान में कुल 36 मिनट का समय लगता है, जिसमें योजना (शून्य मिनट), शिक्षण (6 मिनट), प्रतिपुष्टि (6 मिनट), पुनः योजना (12 मिनट), पुनः शिक्षण (6 मिनट) और पुनः प्रतिपुष्टि (6 मिनट) शामिल हैं। स्टैनफोर्ड मॉडल में इसके लिए 45 मिनट निर्धारित हैं।
शिक्षण के तीन प्रमुख स्तर और उनके प्रतिपादक
शिक्षण के मुख्य रूप से तीन स्तर होते हैं। पहला 'स्मृति स्तर' है जिसके प्रतिपादक हरबार्ट हैं। दूसरा 'बोध या समझ स्तर' है जिसके प्रणेता मॉरीसन हैं। तीसरा 'चिंतन या विचार स्तर' है जिसे हंट ने प्रतिपादित किया था। परीक्षा में प्रायः वर्णनात्मक या अभिप्रेरणा जैसे भ्रामक तत्वों को शिक्षण के स्तर के रूप में पेश कर भ्रमित किया जाता है।
शिक्षण सूत्रों और विकासात्मक नियमों में भ्रम का निवारण
शिक्षण सूत्र 'विशिष्ट से सामान्य' की ओर चलते हैं, जबकि बाल विकास का नियम 'सामान्य से विशिष्ट' की ओर कार्य करता है। इसी तरह शिक्षण प्रक्रिया 'अनिश्चित से निश्चित' की ओर चलती है, न कि निश्चित से अनिश्चित की ओर। मूर्त से अमूर्त के सूत्र को कभी-कभी परीक्षा में 'ठोस से अमूर्त' या 'दृश्य से अदृश्य' भी लिखकर भ्रमित किया जाता है।
Sections
सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) एवं चक्र
सूक्ष्म शिक्षण के जनक और इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य।
सूक्ष्म शिक्षण का प्रतिपादन स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में हुआ था। इसके जनक डी.डब्ल्यू. एलेन (D.W. Allen) माने जाते हैं और उनके साथ एचिसन व बुश भी इस कार्य में शामिल थे।
सूक्ष्म शिक्षण चक्र का समय और उसके विभिन्न चरण का वर्णन।
सूक्ष्म शिक्षण चक्र में 6 चरण होते हैं। पहला चरण योजना बनाना है। भारतीय प्रतिमान के अनुसार कुल समय 36 मिनट है जिसमें शिक्षण के लिए 6 मिनट, प्रतिपुष्टि के लिए 6 मिनट, पुनः योजना के लिए 12 मिनट, पुनः शिक्षण के लिए 6 मिनट और पुनः प्रतिपुष्टि के लिए 6 मिनट आवंटित होते हैं।
सूक्ष्म शिक्षण के वैकल्पिक नाम और उनकी आवश्यकता।
सूक्ष्म शिक्षण को 'अवश्रेणियन शिक्षण' या 'घटाव शिक्षण' भी कहा जाता है। इसमें कक्षा के आकार, समय और पाठ्यवस्तु की मात्रा को छोटा करके शिक्षण कौशल विकसित किया जाता है।
शिक्षण के स्तर (Levels of Teaching)
शिक्षण के तीन मुख्य स्तर और उनके प्रतिपादक विद्वान।
शिक्षण के तीन स्तर होते हैं: स्मृति स्तर (हरबार्ट द्वारा दिया गया), बोध या समझ स्तर (मॉरीसन द्वारा दिया गया) और चिंतन या विचार स्तर (हंट द्वारा दिया गया)।
चिंतन स्तर और बोध स्तर के व्यावहारिक निहितार्थ।
चिंतन का वास्तविक अर्थ विचार प्रक्रिया को जाग्रत करना तथा समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना है, जबकि बोध स्तर का लक्ष्य सीखी गई विषय-वस्तु की गहरी समझ उत्पन्न करना है।
संप्रेषण (Communication) के प्रमुख घटक
संप्रेषण की परिभाषा और कक्षा उपयोगिता क्या है।
संप्रेषण का अर्थ शिक्षक द्वारा भेजी गई पाठ्यवस्तु की जानकारी को छात्रों द्वारा सफलतापूर्वक ग्रहण करना है। यदि छात्र इसे ग्रहण नहीं कर पाते, तो उसे संप्रेषण नहीं माना जाता।
शिक्षण संप्रेषण प्रक्रिया के पांच महत्वपूर्ण घटक और उदाहरण।
संप्रेषण के पांच मुख्य तत्व हैं: प्रेषक (शिक्षक), प्रापट/ग्राही (छात्र), संदेश (पाठ्यवस्तु), माध्यम (कंप्यूटर, इंटरनेट, टीवी, रेडियो) और प्रतिपुष्टि (फीडबैक)। पुनर्बलन संप्रेषण का मूल संरचनात्मक तत्व नहीं माना जाता।
शिक्षण सूत्र (Teaching Maxims)
विशिष्ट से सामान्य का महत्वपूर्ण नियम और विकास से तुलना।
शिक्षण का सूत्र हमेशा 'विशिष्ट से सामान्य' की ओर चलता है, जबकि मानव विकास का सामान्य नियम 'सामान्य से विशिष्ट' की ओर होता है। छात्र अक्सर परीक्षा में इन दोनों अवधारणाओं में भ्रमित हो जाते हैं।
अनिश्चित से निश्चित और मूर्त से अमूर्त सूत्र की व्याख्या।
शिक्षण कार्य हमेशा 'अनिश्चित से निश्चित' की ओर बढ़ता है। 'मूर्त से अमूर्त' को ही 'ठोस से अमूर्त' और 'दृश्य से अदृश्य' के रूप में जाना जाता है, ताकि छात्र प्रत्यक्ष अनुभव से अप्रत्यक्ष विचारों की ओर बढ़ सकें।
आगमन और निगमन विधियों की आसान पहचान और अंतर।
'ने से निगमन' और 'ने से नियम' यानी नियम से उदाहरण की ओर जाना निगमन विधि है, जबकि उदाहरण से नियम की ओर जाना आगमन विधि है। स्मरण रहे कि निगमन और आगमन शिक्षण की विधियाँ हैं, कोई शिक्षण सूत्र नहीं।
शिक्षण कौशल (Teaching Skills)
प्रश्न कौशल की विशेषताएं और कैसे सार्थक प्रश्न पूछें।
प्रश्न कौशल के अंतर्गत छात्रों से चिंतन और विचार पर आधारित सार्थक प्रश्न पूछने चाहिए। केवल हाँ या ना वाले प्रश्नों की संख्या कक्षा में बढ़ाने से बचना चाहिए क्योंकि इससे बच्चे को सोचने का अवसर नहीं मिलता।
उद्दीपन परिवर्तन कौशल का मुख्य उद्देश्य और उदाहरण।
कक्षा में विद्यार्थियों का ध्यान केंद्रित रखने के लिए शिक्षक द्वारा अपनी आवाज में उतार-चढ़ाव लाना, शारीरिक हाव-भाव और चेहरों के एक्सप्रेशन में बदलाव करना उद्दीपन परिवर्तन कौशल कहलाता है।
प्रस्तावना कौशल और पूर्व ज्ञान के परीक्षण का महत्व।
शिक्षण का सबसे पहला कौशल 'प्रस्तावना कौशल' है। इसके द्वारा शिक्षक छात्रों के पूर्व ज्ञान (अर्जित ज्ञान) का परीक्षण करता है और उसी के आधार पर आगे की शिक्षा प्रदान करता है।
समापन कौशल, पुनर्बलन और प्रदर्शन कौशल की व्याख्या।
पाठ समाप्त होने पर महत्वपूर्ण बिंदुओं को संक्षेप में दोहराना 'समापन कौशल' है। छात्रों का हौसला बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देना 'पुनर्बलन' है, और अमूर्त चीजों को मूर्त वस्तुओं के माध्यम से दिखाना 'प्रदर्शन कौशल' कहलाता है।
शैक्षणिक विधियाँ और मनोवैज्ञानिक संकल्पनाएँ
कौशल सीखने का पहला चरण और अनुकरण की परिभाषा।
किसी भी कौशल को सीखने का प्रथम चरण हमेशा 'अनुकरण' यानी नकल करना होता है। किसी व्यक्ति के बाहरी व्यवहार की नकल करना अनुकरण की श्रेणी में आता है।
प्रजातांत्रिक बनाम एकतांत्रिक शिक्षण पद्धतियाँ और अंतर।
प्रजातांत्रिक (लोकतांत्रिक) शिक्षण वह है जिसमें छात्रों की सक्रिय भागीदारी होती है। व्याख्यान विधि (Lecture Method) एक शिक्षक-केंद्रित विधि है जो प्रजातांत्रिक नहीं है क्योंकि इसमें छात्रों की भागीदारी शून्य होती है।
प्रगतशील शिक्षा और अनुभवात्मक समस्या समाधान उपागम।
जॉन डीवी द्वारा स्थापित प्रगतिशील शिक्षा मुख्य रूप से बच्चों के अनुभवों और समस्या समाधान पर केंद्रित होती है। इसमें बच्चों को प्रत्यक्ष अनुभव देकर सिखाने पर जोर दिया जाता है।
शिक्षा में अवरोध (Stagnation) और उसके व्यावहारिक मायने।
शिक्षा में 'अवरोध' का तात्पर्य किसी भी बालक को एक वर्ष से अधिक समय तक असफल करके या रोककर एक ही कक्षा में बनाए रखने से है। यह बच्चे की प्रगति को बाधित करता है।
समस्या समाधान का प्रथम चरण और उसमें सहायक अवरोधक।
समस्या समाधान का सबसे पहला और अनिवार्य चरण 'समस्या की पहचान' करना है। इसके समाधान में चिंता और निराशा बाधक तत्व हैं जबकि अंतर्दृष्टि (सूझ) सहायक सिद्ध होती है।
शिक्षक द्वारा सही व्यवहार प्रस्तुतीकरण की भूमिका।
चूँकि छात्र शिक्षक को अपना रोल मॉडल मानते हैं और उनके व्यवहार का अनुकरण करते हैं, अतः छात्रों में सही व्यवहार सिखाने हेतु स्वय शिक्षक द्वारा सही व्यवहार का प्रस्तुतीकरण सबसे उत्तम तरीका है।
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