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शरणागति का ऐसा गहरा रहस्य शायद ही सुना होगा - मन संसार से हटकर प्रभु में लगने लगेगा #motivation

Summary

यह वीडियो शरणागति के 15 साधनों का वर्णन करता है। इसमें नित्य निरंतर प्रभु का भजन, उन्हें सर्वव्यापी समझना, कर्मों में उनकी प्रेरणा देखना, उन्हें सबसे प्रिय मानना, उन पर पूर्ण विश्वास रखना, उनके अनुकूल आचरण करना, सब कुछ उनका समझना और उनसे कुछ न चाहना, उनके विधान में प्रसन्न रहना, उन्हें पिता, माता, बंधु, सखा, स्वामी, धन, गति और विद्या समझना, अपने को उनका सेवक मानना, पाप कर्मों में स्वयं को कर्ता मानना, और विशुद्ध हृदय से प्रार्थना करना शामिल है।

Key Insights

शरणागति केवल आश्रित होना नहीं, बल्कि एक सचेत साधना है जिसमें 15 विशिष्ट क्रियाएं शामिल हैं।

शरणागति को केवल प्रभु पर निर्भर रहने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक सक्रिय साधना है। वीडियो में जिन 15 साधनों का उल्लेख किया गया है, वे बताते हैं कि शरणागति का अर्थ है प्रभु के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण और आचरण अपनाना, जिसमें निरंतर भजन, विश्वास, समर्पण और अनुकूल आचरण शामिल है।

शरणागति में ईश्वर को सर्व-सम्बन्धित परम प्रियतम के रूप में देखना और उनके विधान में प्रसन्न रहना महत्वपूर्ण है।

शरणागति के साधनों में ईश्वर को केवल एक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपने सबसे प्रियतम, पिता, माता, बंधु, सखा, स्वामी, सहायक, धन, गति और विद्या के रूप में देखना शामिल है। इसके साथ ही, उनके द्वारा की गई हर रचना या विधान में प्रसन्न रहना और उसमें अनुकूलता का अनुभव करना शरणागति का एक महत्वपूर्ण अंग है।

Sections

शरणागति के मुख्य साधन

नित्य निरंतर प्रभु का अनन्य भजन करना।

शरणागति का पहला और सबसे महत्वपूर्ण साधन है निरंतर, अनन्य भाव से प्रभु का भजन या स्मरण करते रहना। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें प्रभु से विमुखता नहीं होती।

प्रभु को अखिल विश्व रूप से प्रकट समझना।

ईश्वर को केवल एक स्थान पर सीमित न मानकर, उन्हें सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त और उसके रूप में प्रकट समझना चाहिए। हर दृश्य और अदृश्य वस्तु में प्रभु का अंश देखना शरणागति का एक अंग है।

कर्मों में प्रभु की प्रेरणा और शक्ति देखना।

अपने द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कर्म और उसमें लगने वाली शक्ति को प्रभु की ही प्रेरणा और उसका कार्य समझना चाहिए। इससे कर्तापन का भाव कम होता है।

प्रभु को सबसे बढ़कर परम प्रियतम समझना।

सृष्टि में जितने भी प्रियजन या वस्तुएं हैं, उनमें प्रभु को सबसे प्रिय और श्रेष्ठ मानना चाहिए। अन्य सभी प्रियताएँ उनसे ही उपजी हैं।

प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखना।

ईश्वर की क्षमता, उनकी कृपा और उनके न्याय पर अटूट और पूर्ण विश्वास रखना शरणागति का एक अनिवार्य अंग है। यह विश्वास हर परिस्थिति में बना रहना चाहिए।

सर्वदा प्रभु के अनुकूल आचरण करना।

अपने सभी कार्यों और व्यवहारों को प्रभु की इच्छा और उपदेशों के अनुरूप रखना चाहिए। उनके दिखाए मार्ग पर ही चलना शरणागत का धर्म है।

सब कुछ प्रभु का समझना और उनसे कुछ न चाहना।

अपनी संपत्ति, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सब कुछ प्रभु का ही समझना चाहिए। साथ ही, इन से या इन के फल के रूप में प्रभु से कुछ भी याचना न करना शरणागति की पराकाष्ठा है।

प्रभु के विधान में प्रसन्न रहना और अनुकूलता अनुभव करना।

प्रभु की ओर से जो भी परिस्थिति, सुख या दुःख आए, उसमें प्रसन्न रहना और उसे अपने हित में समझना चाहिए। उनकी इच्छा में अपनी प्रसन्नता ढूँढनी चाहिए।

प्रभु को सभी सम्बन्धों में श्रेष्ठ मानना और उनके गुण-गान करना।

प्रभु को अपना परम स्नेही पिता, वात्सल्यमयी माता, हितैषी बंधु, सुहृद सखा, कृपालु स्वामी, सहायक धन, उत्तम गति और प्रकाशकारी विद्या के रूप में हृदय से स्वीकार करना। साथ ही, उनके नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन व स्मरण करना।

शुभ कर्मों में प्रभु को प्रेरक और संचालक समझना।

जब भी कोई शुभ कर्म किया जाए, तो यह समझना चाहिए कि उसे करने की प्रेरणा और संचालन प्रभु से ही हो रहा है। यह ईश्वरीय शक्ति का ही कार्य है।

प्रतिकूल कार्यों से विरक्ति और उदासीनता।

प्रभु के प्रतिकूल माने जाने वाले किसी भी कार्य को न करना और प्रत्येक प्रतिकूल वस्तु (चाहे वह कितनी भी प्रिय या आवश्यक क्यों न हो) के प्रति उदासीन और विरक्त रहना चाहिए।

महापुरुषों का संग करना।

उन महापुरुषों का संग करना चाहिए जो प्रभु की यथार्थ शरण को प्राप्त कर चुके हैं और उसके मर्म को समझते हैं। उनका सानिध्य शरणागति के मार्ग को सुगम बनाता है।

स्वयं को प्रभु का नित्य सेवक समझना।

अपनी पहचान किसी और से न जोड़कर, स्वयं को सदा प्रभु का नित्य दास या सेवक मानना चाहिए। यह निम्नता नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण समर्पण है।

पाप कर्मों में स्वयं को कर्ता मानना।

अपने द्वारा किए गए प्रत्येक पाप या अवगुण के लिए स्वयं को ही उसका कर्ता मानना चाहिए, न कि किसी और को दोष देना। यह आत्म-सुधार की ओर पहला कदम है।

विशुद्ध हृदय से प्रभु से प्रार्थना करना।

अंतःकरण को शुद्ध करके, पूर्ण भाव से प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे अपनी ओर खींचे और शरणागति में स्थिर रखें। यह प्रार्थना आत्मा की गहराई से आनी चाहिए।


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